KAVYA MAYANKA

Tuesday, September 23, 2008

विवेकानंद कैरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ की गतिविधियाँ



























विवेकानंद कैरियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ की गतिविधियाँ







Wednesday, October 11, 2006

खुद्दारी

खसोची समझी साज़िश का शिकार हुआ।
आम आदमी अब कितना लाचार हुआ।।

छाया वाले वृक्ष हट गये तो जाना
अब घर में जीना कितना दुश्वार हुआ।

।जब भी हम खुशियाँ तलाशने पहुँचे तो
हमने देखा उसका बंद बजार हुआ ।।

जीवन को यथार्थ में उसने तब जाना
जब वो दनियाँदारी से दो चार हुआ।।

हमने जिसको अपना रहकर समझा था
वही हमारी राहों की दीवार हुआ।।

औलादों ने उन्हे सडक पर छोड दिया
जब से घर सम्पत्ती पर अधिकार हुआ।।

आम आदमी इतना नहीं जंगली था
अब तो सचमुच को पूरा खूँखार हुआ।।

तुम लोगों को समझाके थक जाओगे
इस दुनियाँ में किसका बेडापार हुआ।।

तुझको भी बक्शीश में ओहदे मिल जाते
व्यर्थ सजीवन तूँ इतना खुद्दार हुआ।।

Friday, September 29, 2006

धुंध

छायी है धुंध कुछ दिनों से आसमान पर
पंछी कहाँ को जायें अब लम्बी उडान पर।।

तूफान में पतवार चलाना फिज़ूल है
कश्ती तो अब बहेगी हवा के रूझान पर।।

बाजार में वे लोग ही अक्सर ठगे गये
जो माल खरीदने गए ऊँची दुकान पर।।

इस दौर में उसका नहीं है ठौर ठिकाना
काबू जो नहीं रख सके अपनी ज़ुबान पर।।

चमकी है अँधेरे में कहीं जोर की बिजली
किसको पता कहाँ गिरी किसके मकान पर।।

Thursday, September 28, 2006

सूरज फिसल गया

दो चार दिन में यार तूँ कितना बदल गया।
ये किसका है कमाल किसका जादू चल गया।।

राहों के पत्थरों ने मुझे रोकना चाहा
मैं गिरा तो कई बार फिर बचकर निकल गया।।

तूने किया था शाम को मिलने का वायदा
अब क्या करूँ कि हाथ से सूरज फिसल गया।

मैं गर्दिशे तूफान से जी भर के लडा हूँ
ले देख उसकी ज़द से मैं बाहर निकल गया।।

खिलते हुए फूलों को पकडने के वास्ते
एक बच्चा अपने कद से भी ज्यादा उछल गया।।

देखी गई न प्यास अधिक जब ज़मीन की
वो पास खडा देख हिमालय पिघल गया।।

Monday, September 25, 2006

दिन गुजर गये

हम सोचते ही रह गये और दिन गुजर गये।
जो भी हमारे साथ थे जाने किधर गये।।

बेटी की बिदा हो गयी शहनाई भी बजी
फिर ऐसा क्या हुआ सभी सपने बिखर गये।।

घर से गये जो एक बार आज के बच्चे
वापिस वे जिन्दगी में दुबारा न घर गये।।

महफिल में तेरी सभी लोग झूम रहे थे
पहुंचे जो हम तो सभी के चेहरे उतर गये।।

समझा के थक गये तो स्वयं मौन हो गये
कहने लगे बच्चे कि अब पापा सुधर गये।।

Friday, September 22, 2006

सजीवन मयंक
जन्मः- २१ अक्टूबर सन १९४३ होशंगाबाद ( म,प्र,) में
शिक्षाः- एम,एस,सी,(रसायन शास्त्र) बी,एड, हिन्दी विशारद
कार्यक्षेत्रः- साठ के दशक से लेखन प्रारंभ सन १९६२ में अखिल भारतीय काव्य प्रतियोगिता में पुरष्कृत।धर्मयुग,कादम्बिनी, साप्ताहिक हिन्दुस्तान,सारिका मधुमती,भारती, रंगचकल्लस,इंगित,सरिता ,मुक्ता,योजना, आरोग्यसंदेश सहित अनेक समाचार पत्रों में रचनाएं प्रकाशित।आकाशवाणी और दूरदर्शन पर काव्य पाठ।
लेखन विधाः- गीत, गजल, मुक्तक,क्षणिकाएं आदि।
प्रकाशित कृतियाँ -- माटी चन्दन है, उजाले की कलम, गाते चलें पढाते चलें, फागुन आने वाला है।
सम्प्रतिः- प्राचार्य पद से अवकाश प्राप्त।
सम्पर्कः-२५१-शनिवरा वार्ड नरसिंहगली होशंगाबाद(म,प्र,)
दूरभाषः- (०७५७४)२५२८५० , ९४२५०४३६२७
E-mail- sajeevan_gubrelay@yahoo.co.in