KAVYA MAYANKA

Friday, September 29, 2006

धुंध

छायी है धुंध कुछ दिनों से आसमान पर
पंछी कहाँ को जायें अब लम्बी उडान पर।।

तूफान में पतवार चलाना फिज़ूल है
कश्ती तो अब बहेगी हवा के रूझान पर।।

बाजार में वे लोग ही अक्सर ठगे गये
जो माल खरीदने गए ऊँची दुकान पर।।

इस दौर में उसका नहीं है ठौर ठिकाना
काबू जो नहीं रख सके अपनी ज़ुबान पर।।

चमकी है अँधेरे में कहीं जोर की बिजली
किसको पता कहाँ गिरी किसके मकान पर।।

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