सूरज फिसल गया
दो चार दिन में यार तूँ कितना बदल गया।
ये किसका है कमाल किसका जादू चल गया।।
राहों के पत्थरों ने मुझे रोकना चाहा
मैं गिरा तो कई बार फिर बचकर निकल गया।।
तूने किया था शाम को मिलने का वायदा
अब क्या करूँ कि हाथ से सूरज फिसल गया।
मैं गर्दिशे तूफान से जी भर के लडा हूँ
ले देख उसकी ज़द से मैं बाहर निकल गया।।
खिलते हुए फूलों को पकडने के वास्ते
एक बच्चा अपने कद से भी ज्यादा उछल गया।।
देखी गई न प्यास अधिक जब ज़मीन की
वो पास खडा देख हिमालय पिघल गया।।
दो चार दिन में यार तूँ कितना बदल गया।
ये किसका है कमाल किसका जादू चल गया।।
राहों के पत्थरों ने मुझे रोकना चाहा
मैं गिरा तो कई बार फिर बचकर निकल गया।।
तूने किया था शाम को मिलने का वायदा
अब क्या करूँ कि हाथ से सूरज फिसल गया।
मैं गर्दिशे तूफान से जी भर के लडा हूँ
ले देख उसकी ज़द से मैं बाहर निकल गया।।
खिलते हुए फूलों को पकडने के वास्ते
एक बच्चा अपने कद से भी ज्यादा उछल गया।।
देखी गई न प्यास अधिक जब ज़मीन की
वो पास खडा देख हिमालय पिघल गया।।


1 Comments:
At 4:39 AM,
गीता पंडित said…
waah....
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