KAVYA MAYANKA

Monday, September 25, 2006

दिन गुजर गये

हम सोचते ही रह गये और दिन गुजर गये।
जो भी हमारे साथ थे जाने किधर गये।।

बेटी की बिदा हो गयी शहनाई भी बजी
फिर ऐसा क्या हुआ सभी सपने बिखर गये।।

घर से गये जो एक बार आज के बच्चे
वापिस वे जिन्दगी में दुबारा न घर गये।।

महफिल में तेरी सभी लोग झूम रहे थे
पहुंचे जो हम तो सभी के चेहरे उतर गये।।

समझा के थक गये तो स्वयं मौन हो गये
कहने लगे बच्चे कि अब पापा सुधर गये।।

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