KAVYA MAYANKA

Wednesday, October 11, 2006

खुद्दारी

खसोची समझी साज़िश का शिकार हुआ।
आम आदमी अब कितना लाचार हुआ।।

छाया वाले वृक्ष हट गये तो जाना
अब घर में जीना कितना दुश्वार हुआ।

।जब भी हम खुशियाँ तलाशने पहुँचे तो
हमने देखा उसका बंद बजार हुआ ।।

जीवन को यथार्थ में उसने तब जाना
जब वो दनियाँदारी से दो चार हुआ।।

हमने जिसको अपना रहकर समझा था
वही हमारी राहों की दीवार हुआ।।

औलादों ने उन्हे सडक पर छोड दिया
जब से घर सम्पत्ती पर अधिकार हुआ।।

आम आदमी इतना नहीं जंगली था
अब तो सचमुच को पूरा खूँखार हुआ।।

तुम लोगों को समझाके थक जाओगे
इस दुनियाँ में किसका बेडापार हुआ।।

तुझको भी बक्शीश में ओहदे मिल जाते
व्यर्थ सजीवन तूँ इतना खुद्दार हुआ।।

3 Comments:

  • At 9:13 AM, Blogger बोधिसत्व said…

    कटारे जी,
    सादर प्रणाम
    आप की रचना बहुत अच्छी लगी । बस पहली पंक्ति से ख हटालें।
    आप से एक निवेदन है।
    मेरे पास कभी (तय तो यही हुआ था) कि एक प्रति थी। पर वो गुम गई है। मैंने शरद जी के तमाम जानकारों से उस संग्रह की मांग की पर लहीं मिला। उनके नामोल्लेख की यहां कोई आवश्यकता नहीं समझता।
    आप कैसे भी क्या
    1- वह संग्रह मुझे दिला सकते हैं
    2- क्या आप शरद की एक जैसी भी फोटो हो मुहैया करा सकते हैं।
    3-उनके परिजनों का पता भी दें,
    मुझे शरद पर क लेख लिखना है, कुछ कविताए याद हैं लेकिन मात्र स्मृति के सहारे लेख लिखना ठीक नहीं रहेगा।
    मेरा मो.नं.
    0-9820212573
    भाई यह काम हो जाएगा तो अच्छा रहेगा। आप का उपकार मानूँगा।

     
  • At 12:06 PM, Blogger बोधिसत्व said…

    कटारे भाई
    आप की बातों से मेरा मन भी द्रवित है। आप भाई साहब को मेरा पता दें । आप लोग जो कहेंगे करूँगा।
    बोधिसत्व
    श्री गणेश कोऑपरेटिव हाउसिंग सोसायटी
    सेक्टर नं.3,प्लॉट नं.223, फ्लैट नं.3
    चारकोप, कांदिवली (पश्चिम) मुंबई-400067

     
  • At 4:36 AM, Blogger गीता पंडित said…

    छाया वाले वृक्ष हट गये तो जाना
    अब घर में जीना कितना दुश्वार हुआ।

    ।जब भी हम खुशियाँ तलाशने पहुँचे तो
    हमने देखा उसका बंद बजार हुआ ।।


    har sher sundar.....aabhar..

    pahlee baar aapko padaa...bahut achchha laga....

    shubh-kaamnaen
    Gita

     

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