खुद्दारी
खसोची समझी साज़िश का शिकार हुआ।
आम आदमी अब कितना लाचार हुआ।।
छाया वाले वृक्ष हट गये तो जाना
अब घर में जीना कितना दुश्वार हुआ।
।जब भी हम खुशियाँ तलाशने पहुँचे तो
हमने देखा उसका बंद बजार हुआ ।।
जीवन को यथार्थ में उसने तब जाना
जब वो दनियाँदारी से दो चार हुआ।।
हमने जिसको अपना रहकर समझा था
वही हमारी राहों की दीवार हुआ।।
औलादों ने उन्हे सडक पर छोड दिया
जब से घर सम्पत्ती पर अधिकार हुआ।।
आम आदमी इतना नहीं जंगली था
अब तो सचमुच को पूरा खूँखार हुआ।।
तुम लोगों को समझाके थक जाओगे
इस दुनियाँ में किसका बेडापार हुआ।।
तुझको भी बक्शीश में ओहदे मिल जाते
व्यर्थ सजीवन तूँ इतना खुद्दार हुआ।।
खसोची समझी साज़िश का शिकार हुआ।
आम आदमी अब कितना लाचार हुआ।।
छाया वाले वृक्ष हट गये तो जाना
अब घर में जीना कितना दुश्वार हुआ।
।जब भी हम खुशियाँ तलाशने पहुँचे तो
हमने देखा उसका बंद बजार हुआ ।।
जीवन को यथार्थ में उसने तब जाना
जब वो दनियाँदारी से दो चार हुआ।।
हमने जिसको अपना रहकर समझा था
वही हमारी राहों की दीवार हुआ।।
औलादों ने उन्हे सडक पर छोड दिया
जब से घर सम्पत्ती पर अधिकार हुआ।।
आम आदमी इतना नहीं जंगली था
अब तो सचमुच को पूरा खूँखार हुआ।।
तुम लोगों को समझाके थक जाओगे
इस दुनियाँ में किसका बेडापार हुआ।।
तुझको भी बक्शीश में ओहदे मिल जाते
व्यर्थ सजीवन तूँ इतना खुद्दार हुआ।।

