धुंध
छायी है धुंध कुछ दिनों से आसमान पर
पंछी कहाँ को जायें अब लम्बी उडान पर।।
तूफान में पतवार चलाना फिज़ूल है
कश्ती तो अब बहेगी हवा के रूझान पर।।
बाजार में वे लोग ही अक्सर ठगे गये
जो माल खरीदने गए ऊँची दुकान पर।।
इस दौर में उसका नहीं है ठौर ठिकाना
काबू जो नहीं रख सके अपनी ज़ुबान पर।।
चमकी है अँधेरे में कहीं जोर की बिजली
किसको पता कहाँ गिरी किसके मकान पर।।
छायी है धुंध कुछ दिनों से आसमान पर
पंछी कहाँ को जायें अब लम्बी उडान पर।।
तूफान में पतवार चलाना फिज़ूल है
कश्ती तो अब बहेगी हवा के रूझान पर।।
बाजार में वे लोग ही अक्सर ठगे गये
जो माल खरीदने गए ऊँची दुकान पर।।
इस दौर में उसका नहीं है ठौर ठिकाना
काबू जो नहीं रख सके अपनी ज़ुबान पर।।
चमकी है अँधेरे में कहीं जोर की बिजली
किसको पता कहाँ गिरी किसके मकान पर।।


